kavita

...जिस्म अब ख़त्म हो और रूह को जब सांस आये .. मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको .....

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kavita1980


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वर्जनाएं

Posted On: 12 Jul, 2016  
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Junction Forum Social Issues कविता में

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बस,उतना ही आसमान मेरा है…

Posted On: 22 Jun, 2016  
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Junction Forum Social Issues कविता में

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माँ का घर

Posted On: 30 May, 2016  
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बदलते मिज़ाज़

Posted On: 30 May, 2016  
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कलम और तलवार -एक नया नजरिया

Posted On: 6 Feb, 2016  
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बदलते मौसम

Posted On: 19 Jan, 2016  
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जाला ना करेजवा बिन्धाय हो

Posted On: 19 Jan, 2016  
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पुनरागमन

Posted On: 15 Jan, 2016  
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दान -समर्पित आज के दिन को –संक्रांति

Posted On: 14 Jan, 2016  
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सृजन

Posted On: 12 Jan, 2016  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

篁Æ様、貴重なお話お聞かせいただいてありがとうございます。やはり程度の差はあれ、産後の動き過ぎは後々ツケが回ってきますかね・・・。家族だけで仕事をしている分には人目がなく、赤ちゃん転がしながら仕事をして、おっぱい出そうが気兼ねがないので、おそらくこのまま人を雇うという事はないと思います。とりあえず、現在私£¯å¸å£²ã‚Šã®é…é”を全て担当していますが、それは主人に行ってもらって、産後1ヵ月は店で大人しく店番だけする事にします。家事の面で、行政のサービス㚪り利用出来るというのはあまり知らなくて、全然調べてなかったんですが、市役所に聞いてみることにします。期間限定ですし、ある程度はお金で解決ですかね~。実は保育園の保護者会の会計もやっているんですが、それは事情を知っているクラスのお母さんが、出産前後代わってくれることになっているので、本当にありがたいです。しかし今考えてみると、もしお姑さんが倒れた後寝たきりになっていたら、更に大変な日々だったでしょうね・・・。そういう事も考えてのピンピンコロリだったのかと思うと、お姑さんには本当に感謝です。出産当日まで働いているせいか、私は毎回早産で、1人目36週、2人目34週で出産でしたので(でも2人とも2500グラム越え。そして超安産ü‰ã€ä»Šå›žã¯ä½•ã¨ã‹ã‚‚う少し持たせて出産したいものです。無理はせず、でも頑張ります!2b4f

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धन्यवाद यमुना जी ,आपका व्यक्तव्य १०० प्रतिशत सही है / था क्योंकि कुछ वर्षों या एकाध दशक से समझ लें की राम जी की छवि पर बहुत प्रश्नचिन्ह लगाए जा रहे हैं --मसलन महिला वादियों द्वारा सीता के प्रति उनके तमाम परीक्षाओं के कारण ,दलित समाज के कई लेखकों ने ऊँ पर एक दलित भक्त के शिरोच्छेदन ;जब वह तपस्यारत था (इसका विवरण वाल्मीकि रामायण में है संभवतः )के कारण उन्हें जातिवादी घोषित कर रखा है कतिपय रावण को पूजने वालों के लिए वे शत्रु हैं ही --मेरे कहने का अर्थ सिर्फ यही है की कितना भी बड़ा व्यक्तित्व क्यों न हो विरोध तो होते ही हैं आलोचना होगी ही आप एक समय में सबको खुश रख सकें ये असंभव है -इतिहास लिखे जाते हैं विजेताओं की कलम से उनके अनुसार --पूर्ण सत्य कभी सामने नही आते

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आदरणीय श्री राजेशजी ,हालांकि मेरी कविता इस विषय पर नहीं थी मगर शायद --शायद आप इस बात से काफी उद्द्वेलित हैं की महिलाओं को भी उनकी दुर्गति का ज़िम्मेदार माना जाना चाहिए क्यों और कैसे के सम्बन्ध में आपके तर्क दो तरह से हैं १ महिला स्वंतंत्रता जिसका वो अनुचित रूप से इस्तेमाल कर रही हैं और २ महिला उत्पीडन के विविध रूप जिसमें औरतें भी शामिल हैं प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में . अभी का आपका प्रश्न महिला उत्पीडन से सम्बंधित है तो प्रथम इसे ही लेते हैं -अपराध --सिर्फ अपराध है उसमें शामिल किसी भी व्यक्ति को आप दोषी ठहरा सकते हैं व्यक्ति विशेष के रूप में न की उसके जाती विशेष, वर्ग विशेष अथवा लिंग विशेष के रूप में ;उदाहरण के तौर पर --आतंकवादी व्यवस्था जो चल रही है एक वर्ग विशेष की मूलभूत शिक्षा के कारण है -जिसके कारण कितने किशोरों, बच्चों और अब महिलाओं को भी शामिल किया जा रहा है. क्या इसे आप पुरुष का पुरुष पर अत्याचार, के रूप में देखते हैं ;नहीं न --फिर ये महिलाओं के महिला विरोध का उदाहरण कैसे हो सकता है --महिला तस्करी हो या बच्चों की तस्करी महिला के उसमें शामिल होने से -अपराध थोडा आसान हो जाता है क्यों की उस पर विश्वास आसानी से होता है -इस विश्वास को जो तोड़ता है वो अपराधी होगा औरत या पुरुष वर्ग नहीं, कोई व्यक्ति किसी से उधार ले, वापस करने की बिना पर और नीयत में खोट हो तो ये उस व्यक्ति का विकार है न की पुरुष का पुरुष के प्रति द्रोह --रह गयी बात दहेज़ की या वधु प्रताड़ना की तो क्या ये हर घर में होता है या जहां होता है वहां पुरुष शामिल नहीं होते ? ये वो स्थिति है जो पूरे एक सामाजिक परिवेश से जुडी है ,ये वो स्थिति है जिसमें एक लाचार मेमने को हाथ पाँव बाँध कर भूखे भेड़ियों के बीच फेक दिया गया है, जिसकी जंजीरें हैं संस्कारों की ,समाज की ,आत्म निर्भर न होने की. इसके लिए पूरा समाज दोषी है ,खुद हम और आप दोषी हैं जो अपनी लड़कियों को आत्म निर्भर बनने से वंचित रखते हैं, उनके आगे बढ़ने के मौकों को कुर्बान कर देते हैं अपने पुरुष वर्ग की प्रगति के लिए -- जहां लडकी घर से बाहर कदम निकाले ,आत्मनिर्भर होने की कोशिश करें तो चरित्र का रोना लेकर बैठ जाते हैं, बॉस से बात करे ,पुरुष मित्रों से मदद ले तो विशेष नजरिया इस्तेमाल होता है देखने का ,क्या गौसिप सिर्फ महिलाएं करती हैं ?जी नहीं ;पुरुष वर्ग भी उतना ही इंटरेस्ट लेता है इन चर्चाओं में ,तो एक्पूरी सामाजिक व्यवस्था को आप एक वर्ग विशेष के रूप में नहीं ले सकते -- जहां तक स्वतंत्रता के गलत इस्तेमाल की बात आप कर रहे हैं तो उसे आप एक व्यक्ति विशेष के तौर पर ही देखें न ;समाज में जब इतनी गिरावट आ गयी है की हर व्यक्ति को समझौते करने होते हैं कहाँ और किस स्तर तक ये उसका विवेक तय करता है हम और आप नहीं -ये उसका अधिकार है

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के द्वारा: यशवन्त यश यशवन्त यश

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के द्वारा: skjaiswalskj skjaiswalskj

धन्यवाद संतोष जी लिखते समय दिमाग नही दिल से लिखती हूँ ,भावनाओं की स्याही बना कर;शाएद इसलिए उनको छू कर जाते हैं मेरे शब्द जो दिल रखते हैं। आज के इस धर्म जाति वर्ग भेद से भरी दुनिया में आज भी देश सर्वोपरि है मेरे लिए मटा पिता से मिले संस्कारों के कारण। राजनीतिक दलों और स्वार्थलोलुप लोगों के दुष्चक्र देखती हूँ ,वोट के चलते लोगों को बांटने के लिए तो दिल रोता नही खून खौलता है ;पर मेरा ही क्यों ?क्या हम सब सुख और शांति नही चाहते? फिर क्यों फँसते हैं इन धूर्तों के कुचक्र में इन धर्म की बन्दिशों जाती के झगड़ों को छोड़ ,अतीत में क्या हुआ, किसने क्या किया, भूल कर हम एक समाज क्यो नही बनाते जिस में सब को एक समान मौके दिये जाएँ और सबके लिए एक ही कानून हो सामाजिक व्यवस्था हो धर्म मन के भाव हैं व्यक्तिगत चीज है सड़कों पर उसका प्रदर्शन किसी तरह भी उचित नही सिर्फ यही एक व्यवस्था कितने उभरते विरोधों की नींव पर कुठाराघात कर सकती है कहीं भी योग्यता के आधार पर चयन कितनी असमानताओं को दूर कर असंख्य प्रतिभाओं के पलायन को रोक देश को चहुमुखी विकास के तरफ ले जा सकता है ऐसी न जाने कितनी व्यवस्थाएँ हैं जो लायी जा सकती हैं बशर्ते हम सोचें सिर्फ देश के लिए एक भारतवासी की तरह न की एक हिन्दू मुसलमान हरिजन ब्राह्मण की तरह मगर इसे अमली जामा कौन पहनाएगा ये स्वार्थान्ध नेता --नही हमें एक होना होगा और एक मजबूत आदमी को चुनना होगा और सिर्फ प्रगति को चुनना होगा

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धन्यवाद भ्रमर जी सिर्फ एक बार इस महासमर में यदि हर व्यक्ति अपने सारे संकीर्ण स्वार्थों को दरकिनार कर सिर्फ और सिर्फ देश की सुरक्षा के विषय में सोच कर देश कीप्रगति और देश के विकास के लिए मतदान करे तो कोई वजह नही की हम विश्व के अग्रणी देशों में न खड़े हों --क्या नही है हमारे पास हम ने अतीत में कर के दिखाया है हम भविष्य में कर के दिखा सकते हैं लेकिन इसके लिए हमें एक होना होगा और विभिन्न भेदों को राज नीतिक लाभोंके लिए नही वरन वास्तविक रूप में दिल से हटाना होगा जहां हर नागरिक सिर्फ और सिर्फ भारत का नागरिक हो समान आचार संहिता समान कानून सबकेलिए बहुत हो चुका आरक्षण बहुत हो चुकी अलग अलग पूजा पद्धतियाँ अब जो भी हो सिर्फ देश के लिए जब तक ये नही होता हम विकास नही कर सकते हमारी ऊर्जा आपस के मतभेदों में और एक दूसरे को नीचा दिखाने में जाएगी इसके लिए हमें एक मजबूत सरकार चाहिए और एक असरदार व्यक्तित्व क्योंकि तथाकथित धर्मनिरपेक्षा शक्तियाँ एडी से चोटी तक का ज़ोर लगा देंगी इसके विरुद्ध हमें एक होना होगा घृणा नही प्रेम के बल पर मगर दृढ़ता से दीन बन कर नही

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धन्यवाद दीपक जी सुखद आश्चर्य हुआ की इतनी जल्दी आप की प्रतिक्रिया मिल गई -सच कहा आपने दीपक जी -आज- कहें या बहुत पहले से भी; बाहर वालों से अधिकबच्चियों को अपनों से बचाना पड़ता है और जब भी कोई इस तरह की घटना किसी मासूम के साथ होती है उम्र भर के लिए निशान छोड़ जाती है --वैसे एक और सोच मेरे मन में कहीं नेपथ्य में थी इसे लिखते हुए मेरा प्रोफेशन कुछ ऐसा है जिसमें बहुत सी मुस्लिम महिलाएं लड़कियां मेरे करीब आती हैंउनमें अक्सर ही मैंने देखा है की बहुत ज़हीन लड़कियां भी हैं जो पढ़ना चाहती हैं और कुछ करना भी मगर उनके सपनों को कुचले जाते मैंने देखा है और महसूस किया है इस दंश को बेहद गहराई से -मगर मजहब एक ऐसी बेड़ी है इनके लिए जिसकी वजह से हम चाहते हुए भी कुछ कर नही सकते इन कोंपलों के लिए

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नमस्कार कविता जी .... उन महानुभाव द्वारा दिया गया कमेंट पढ़ा,,,,, सच में उनकी प्रतिक्रिया का आपकी कविता से मुझे भी कोई तालमेल नही लगा ...., क्या कविता है और प्रतिक्रिया क्या दी है ... ...., वास्तव में अभी भी हमारे समाज में औरोतों के प्रति नजरिया नही बदला है ...., चाहे बदलने का ढोंग कितना ही क्यों न कर ले ...., एक वर्ग को छोड़कर बाकि सभी एक-जैसा ही सोचते हैं ...., आपने जो प्रतिक्रिया ऊपर लिखी है वो शायद किसी पुरुष ने दी हो लेकिन ऐसी ही कुछ बाते महिलाओ के बारे में मैं खुद कई बार महिलाओ से ही सुन चुकी हूँ ,,,,, आपका जवाब बहुत ही सटीक लगा ....एक महिला अपने परिवार के लिए, समाज के लिए जितना करती है उतना कभी कोई और कर ही नही सकता ...... ......, ...., नीचे आपने मेरे ब्लॉग को सर्च करने में आ रही परेशानी के बारे में लिखा है ........ "sainisoni" मेरा यूजरनाम है ..इसे आप जे जे के होम पेज पर राईट साइड में सर्च वाले कॉलम में लिखिए और सर्च करिये ...मेरा ब्लॉग अवश्य ही आपको मिल जायेगा .... एक बार फिर से बेस्ट ब्लॉगर बनने के लिए बधाई व शुभकामनाये ..... :)

के द्वारा: Sonam Saini Sonam Saini

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के द्वारा: abhishek shukla abhishek shukla

वास्तव में महिला जानभूझकर कमजोर ही रहना चाहती है जिससे सरे काम पुरुषो को ही करने पड़े..नारी केवल अपने बारे में ही सोचती है जब वो दुसरो के बारे में भी सोचने लगेगी तभी वो तरक्की कर पाएगी... पुरुष जो कि महिलाओ से कई गुना ज्यादा काम करते है और कोई भी विपत्ति आने पर वो ही आगे रहते है फिर भी बेशर्म औरते अपना ही गुडगान करती है..देश के लिए जान भी सबसे ज्यादा पुरुष ही देते है..रिक्शॉ टेम्पो बस सब वे ही चलाते है और औरतो के लिए कोई भरी काम नही बताते..आप ये बताइये क्या पुरुष रिक्शॉ चलाकर या मजदूरी करके कमाते है तो क्या ये उल्टा औरतो पर ही अत्याचार है? जब सेना में पुरुष मरते है तब आपलोग क्यों नहीं कहती कि वो वो सहीद होने में हमसे आगे है हमें भी सहीद होना चाहिए?

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PREVIOUS विस्तार पोस्टेड ओन: 26 Feb, 2014 Contest, कविता, जनरल डब्बा, सोशल इश्यू में Share this pageFacebook0Google+0Twitter0LinkedIn0 Rss Feed SocialTwist Tell-a-Friend सदियों काविस्तार है, जन्मों का संगीत है, कोई गुनगुना रहा है- एक सुर ,लय ,ताल -प्रवाह है; निर्बाध, निर्विकार बहता ही जा रहा है. जीवन की सरिता है, प्रेम का उछाह है- अनंत ,चिरंतन सागर में ,लहरों जैसा हाल है- नश्वरता को चुनौती देती चिरंतनता; का साक्षात सदेह प्रमाण है. जीवन खत्म होते रहे, साम्राज्य हाथ बदलते रहे, इसको जीत कौन पाया- काल के भी वश में ये कहाँ आया-! प्रेम -हाँ प्रेम का ही ये विस्तार है- एहसास है ,साम्राज्य है - जो फैला है -अनादि से अनंत तक असीम से निस्सीम तक- इस जीवन से उस जीवन तक- इसे जीत सका है कोई -? इसे जीत सकेगा कोई -? इसे जीत सकता है कोई-? रोक सकता है कोई इस प्रवाह को-? निर्झर सरिता को इस गंगा को -? इसकी पावनता को –? रोको मत -इसे बहने दो- गाँव- गाँव ;शहर- शहर ;देश- देश जन्म- जन्म ;युगों- युगों तक; क्यों कि यही मोक्ष दायिनी है यही है- जो मुक्ति है; यही है- जो ज्ञान है यही रोक सकता है -विनाश को, जाती, धर्म, कुरीतियों से जकड़े समाज को रास्ता दिखा सकता है कोई- तो यही है, यही है वो;- यही-! वाह बहुत खूब http://deepakbijnory.jagranjunction.com/2014/02/25/वृक्षारोपण-कविता/

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के द्वारा: शिल्पा भारतीय "अभिव्यक्ति" शिल्पा भारतीय "अभिव्यक्ति"

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